जब डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति, ने ईरान पर दो हफ्ते के लिए संधि (सीजफायर) की घोषणा की, तो अंतरराष्ट्रीय बाजारों में एक अजीब सी खामोशी छा गई—और फिर कच्चे तेल के दामों में भूकंप लाता हुआ झटका आया। यह कोई छोटी-मोटी गिरावट नहीं थी; बल्कि यह उस तनाव का अंत था जिसने पिछले कुछ महीनों से दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को जकड़ रखा था।
नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस संधि के बाद ही उसी दिन कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई। बातचीत का मुख्य मुद्दा हॉर्मुज की खाड़ी था, जो ओमान की खाड़ी और फारस की खाड़ी को जोड़ती है। दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की समुद्री आपूर्ति यहीं से गुजरती है। युद्ध के कारण यह मार्ग पहले ही बाधित हो चुका था, जिससे कीमतें 120 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं—यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद का सबसे ऊंचा स्तर।
बाजारों में आई अनोखी स्थिति
जैसे ही खबर सामने आई, निवेशकों ने राहत की सांस ली, लेकिन बाजार की प्रतिक्रिया तुरंत और तीव्र थी। लंदन स्थित बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड में अधिकतम 15 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई, जबकि अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) में यह गिरावट 23 प्रतिशत तक पहुंच गई। भारतीय समयानुसार शाम 7 बजकर 15 मिनट (19:15 IST) पर ब्रेंट क्रूड 13.22 प्रतिशत की गिरावट के साथ, जो 14.45 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल की कमी के बराबर थी, 94.82 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के भाव पर कारोबार कर रहा था।
उसी समय WTI क्रूड की कीमत 14.02 प्रतिशत या 15.83 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल की गिरावट के साथ 97.12 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड हो रही थी। नवभारत टाइम्स ने उल्लेख किया कि ईरान युद्ध शुरू होने के बाद WTI क्रूड लगातार 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रहा था, और यह गिरावट उस ऊंचे स्तर से महत्वपूर्ण सुधार मानी गई। सरकारी प्रसारक डीडी न्यूज़ की एक विस्तृत रिपोर्ट में बताया गया कि अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को लेकर सीजफायर का ऐलान होते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 17 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
विशेषज्ञों की चेतावनी: राहत अल्पकालिक?
यहाँ रुककर सोचना जरूरी है। क्या यह गिरावट स्थायी होगी? विशेषज्ञों का मानना है कि शायद नहीं। डीडी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध के कारण बंद हो गए तेल कुओं को फिर से शुरू करने, क्रू और जहाजों को दूसरी जगह से वापस लाने और रिफाइनरी की इन्वेंट्री को फिर से भरने में काफी लंबा समय लग सकता है। इसलिए, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि तेल बाजार में आई यह गिरावट संभवतः केवल एक या दो कारोबारी सत्र ही टिकेगी।
एबीपी न्यूज़ की एक रिपोर्ट में भी संकेत दिया गया कि हालांकि सीजफायर लागू है, लेकिन इसके बीच ही कच्चे तेल की कीमतों में फिर से उछाल दर्ज किया गया। एबीपी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में 3.60 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसके बाद कच्चे तेल की कीमत 105 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के पार चल गई। यह स्पष्ट करता है कि भू-राजनीतिक तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, और कीमतें फिर से 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर के करीब या उसके पार जाकर कारोबार करने लग सकती हैं।
भारत पर क्या असर पड़ेगा?
भारत के लिए यह स्थिति एक तरफ राहत है, तो दूसरी तरफ चिंता का विषय। हिंदी न्यूज चैनल न्यूज़ 18 के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारित एक वीडियो बुलेटिन में एंकर ममता तिवारी ने बताया कि कच्चे तेल के दाम गिरने से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी की संभावना बन सकती है। उन्होंने कहा कि दो हफ्ते के सीजफायर की घोषणा के बाद यह इस युद्ध के बीच आई "सबसे अच्छी खबर" है।
लेकिन चित्र का दूसरा पहलू भी देखना होगा। द प्रिंट की एक रिपोर्ट में भारतीय संदर्भ में पश्चिम एशिया संकट की पृष्ठभूमि में कच्चे तेल की कीमतों की पहले की स्थिति का विवरण दिया गया। नई दिल्ली में एक अंतर-मंत्रालयी ब्रीफिंग के दौरान भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव (मार्केटिंग और ऑयल रिफाइनरी) सुजाता शर्मा ने मंगलवार को बताया कि पश्चिम एशिया के जारी संकट के बीच भारत के लिए इंडियन क्रूड बास्केट की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई थीं। जनवरी में भारत का इंडियन क्रूड बास्केट लगभग 63 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल था, जो मार्च में बढ़कर 113 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल हो गया और अप्रैल में औसतन लगभग 116 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहा।
सरकार की तैयारी और भविष्य की दिशा
सरकार ने आपूर्ति में बाधाओं को रोकने के लिए निगरानी और प्रवर्तन की कार्रवाई तेज कर दी है। सुजाता शर्मा ने बताया कि ब्रीफिंग से एक दिन पहले 2200 से अधिक अचानक निरीक्षण और छापे किए गए। ऑनलाइन बुकिंग में कुछ कमी आई है और यह लगभग 45 से 46 लाख सिलेंडर प्रतिदिन के दायरे में है। कमर्शियल एलपीजी की आपूर्ति काफी हद तक बहाल हो चुकी है।
वैश्विक बाजारों की प्रतिक्रिया भी दिलचस्प रही। सीजफायर की खबर आने के बाद सोने की कीमतों में लगभग 4 प्रतिशत और चांदी की कीमतों में 2 प्रतिशत से अधिक की तेज बढ़त दर्ज की गई। अमेरिकी शेयर बाजार के संकेतक डोव जॉन्स फ्यूचर में 1000 अंकوں से अधिक का उछाल दर्ज किया गया, जबकि जापान के शेयर बाजार सूचकांक निककेई में 5 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया के सूचकांक में 4 प्रतिशत की तेजी के साथ बाजार खुले।
Frequently Asked Questions
क्या पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत घटेंगी?
नहीं, यह तुरंत नहीं होगा। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट का प्रभाव घरेलू कीमतों पर तभी पड़ता है जब रिफाइनरियों की इन्वेंट्री भर जाती है और नई खरीदारी होती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसमें कुछ सप्ताह लग सकते हैं। इसके अलावा, यदि तनाव फिर से बढ़ता है, तो कीमतें वापस ऊपर जा सकती हैं।
हॉर्मुज की खाड़ी क्यों इतनी महत्वपूर्ण है?
हॉर्मुज की खाड़ी दुनिया की सबसे व्यस्त तेल मार्गों में से एक है। इससे दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की समुद्री आपूर्ति गुजरती है। जब इस मार्ग पर बाधाएं आती हैं, जैसे कि युद्ध के दौरान, तो आपूर्ति में कमी आती है और कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं। संधि के बाद जहाजों की आवाजाही सामान्य होने की उम्मीद की जा रही है।
भारत पर इस संकट का क्या प्रभाव पड़ा था?
भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है। संकट के दौरान भारत का इंडियन क्रूड बास्केट जनवरी के 63 डॉलर से बढ़कर अप्रैल में औसतन 116 डॉलर प्रति बैरल हो गया था। इसने देश की व्यापार घाट बढ़ाई और मुद्रास्फीति पर दबाव डाला। सरकार ने एलपीजी की आपूर्ति बनाए रखने के लिए कड़ी निगरानी और छापेमारी की है।
क्या यह संधि स्थायी शांति की ओर इशारा करती है?
हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्ते के लिए संधि की घोषणा की है, लेकिन विशेषज्ञ और मीडिया रिपोर्ट्स संकेत दे रही हैं कि यह अस्थायी राहत है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अभी भी बना है, और एबीपी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, कीमतों में फिर से उछाल दर्ज किया गया है। इसलिए, इसे पूर्ण शांति नहीं, बल्कि एक 'ब्रेक' के रूप में देखा जा रहा है।